LiFE के लिए शांति एक पूर्व शर्त है; व्यवस्था से जुड़ा संघर्ष विकास के लक्ष्यों को ख़तरे में डालता है!

नीतिगत समन्वय करके और सशस्त्र संघर्षों को हतोत्साहित करने वाले समाधानों का प्रस्ताव देकर G20 बढ़ती वैश्विक चुनौतियों से निपटने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
Patrycja Pendrakowska | Krzysztof M. Zalewski

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 नवंबर 2021 को कॉप26 के दौरान “लाइफस्टाइल फॉर द एनवायरमेंट” (LiFE) की घोषणा की. ये ज़्यादा सतत बनाने के लिए उपभोग के स्वरूप को अधिक दिखाने का एक प्रभावशाली प्रयास था. इस प्रस्तावित रूप-रेखा में हर नागरिक और भागीदार सावधानी से प्रतिदिन के उपभोक्ता व्यवहार के माध्यम से हरित परिवर्तन में योगदान देता है.
लेकिन यूरोप और उससे परे युद्ध के इस वर्तमान समय में इन प्रशंसनीय प्राथमिकताओं का शायद उपयोग नहीं किया जा सकता है. बढ़ता सैन्यीकरण एक ज़्यादा अस्थिर अंतर्राष्ट्रीय वातावरण का निर्माण करता है और इसके कारण काफ़ी अधिक अतिरिक्त कार्बन उत्सर्जन एवं पर्यावरणीय प्रदूषण होता है. इस तरह हम ये प्रस्ताव देते हैं कि शांति बनाने के प्रयास LiFE के लिए एक पूर्व शर्त बना रहे. इसके अलावा G20 की बातचीत की रूप-रेखा के भीतर एक वैश्विक जलवायु कर को लागू करने पर विचार किया जाना चाहिए.

हम ये प्रस्ताव देते हैं कि शांति बनाने के प्रयास LiFE के लिए एक पूर्व शर्त बना रहे. इसके अलावा G20 की बातचीत की रूप-रेखा के भीतर एक वैश्विक जलवायु कर को लागू करने पर विचार किया जाना चाहिए.

सशस्त्र संघर्ष किस तरह वैश्विक हरित परिवर्तन को ख़तरे में डालते हैं

सशस्त्र संघर्ष किस तरह वैश्विक हरित परिवर्तन को ख़तरे में डालते हैं
अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक व्यवस्था में वर्तमान तनाव और मौजूदा युद्ध पर्यावरणीय एवं जलवायु नीतियों में परिवर्तन के समर्थन में गंभीर बाधा का निर्माण करते हैं. सीरिया और यमन में मौजूदा क्षेत्रीय संघर्ष समाधान से काफ़ी दूर हैं. अफ़ग़ानिस्तान और इथियोपिया जैसे देशों में राजनीतिक परिस्थिति नाज़ुक बनी हुई है. इन संघर्षों के अतिरिक्त, LiFE पहल की घोषणा के बाद हमने यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के कारण बड़े पैमाने के एक युद्ध को देखा है. इसके अलावा पूर्व एशिया, विशेष रूप से ताइवान स्ट्रेट और दक्षिणी चीन सागर के इर्द-गिर्द, में अस्थिर परिस्थिति भी सामने आई है. निश्चित रूप से सशस्त्र संघर्ष जलवायु संकट को कम करने की कोशिशों के लिए नुक़सानदेह हैं. इस मामले में यूक्रेन युद्ध एक ज्वलंत उदाहरण की तरह है.
फरवरी 2022 से यूक्रेन संघर्ष के दौरान कम-से-कम 2,00,000 सैनिकों की जान जा चुकी है और भारी संख्या में आम लोगों की भी मौत हुई है. UNEP (संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम) की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध के कारण बहुत ज़्यादा रसायनिक प्रदूषण हुआ है और लोगों के रहने एवं प्राकृतिक ठौर-ठिकानों को नुक़सान पहुंचा है. यूक्रेन के पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार पर्यावरणीय नुक़सान के 2,300 उदाहरण सामने आए हैं. युद्ध के कारण अभी तक 2.9 मिलियन हेक्टेयर संरक्षित क्षेत्र और 3 मिलियन हेक्टेयर जंगल पर प्रभाव पड़ा है. इसके अलावा दिसंबर 2021 के OECD (आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन) के पूर्वानुमान की तुलना में 2023 में वैश्विक GDP अब कम-से-कम 2.8 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर कम होने का अनुमान लगाया गया है. युद्ध की वजह से ऊर्जा और खाद्य संकट में जो बढ़ोतरी हुई, उसने कई देशों को सबसे सस्ते लेकिन पर्यावरण को सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुंचाने वाले ईंधन जैसे कि कोयले का उपयोग करने के लिए मजबूर किया है.
सुरक्षा संकट पर ध्यान देने की वजह से जलवायु कार्रवाई समेत बड़ी वैश्विक चुनौतियों पर असर पड़ सकता है. इस बात का भी जोख़िम है कि हथियारों के उत्पादन के लिए आवश्यक लेकिन पर्यावरण को काफ़ी नुक़सान पहुंचाने वाले उद्योगों, जैसे कि इस्पात एवं रासायनिक क्षेत्र, का और विकास हो सकता है.

हथियारों के उत्पादन और सैन्यीकरण का युग

दुनिया भर में सैन्य-औद्योगिक परिसर पहले से ही कार्बन उत्सर्जन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है. वैसे उन्हें 2022 में कॉप27 के मुख्य एजेंडे में जोड़ने की कोशिशें हुई थीं लेकिन सैन्य उत्सर्जन को नियंत्रित करने की कोई रणनीति नहीं है. हथियारों का उत्पादन किसी भी तरह से सतत नहीं है.

सैन्य खर्च में बढ़ोतरी की ये प्रतिबद्धताएं, जिन्हें ख़राब होती अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा स्थिति के संदर्भ में आवश्यक माना जाता है, कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरणीय प्रदूषण में सीधे रूप से योगदान देती हैं.

ब्राउन विश्वविद्यालय के वॉटसन संस्थान ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अमेरिका का रक्षा विभाग जलवायु परिवर्तन में योगदान देने वाले जीवाश्म ईंधन का सबसे बड़ा संस्थागत उपभोक्ता है. चीन और रूस से विश्वसनीय आंकड़े हासिल करना मुश्किल है लेकिन इन देशों में भी सैन्य परिसर के बड़े आकार से विशाल कार्बन उत्सर्जन का संकेत मिलता है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के अनुसार 2021 में रक्षा उद्योग की 100 सबसे बड़ी कंपनियों के द्वारा हथियारों एवं सैन्य सेवाओं की बिक्री 592 अरब अमेरिकी डॉलर पर पहुंच गई जो वास्तविक मायने में 2020 की तुलना में 1.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी है.
यूक्रेन में युद्ध और सुरक्षा पर फिर से ध्यान केंद्रित करने की वजह से दुनिया भर में सैन्य खर्च में और बढ़ोतरी की संभावना है. नॉमिनल GDP के आधार पर दुनिया की तीसरी और चौथी अर्थव्यवस्था जापान एवं जर्मनी ने सैन्य और रक्षा खर्च में भारी बढ़ोतरी करते हुए इसे GDP का 2 प्रतिशत करने की प्रतिबद्धता जताई है. संघर्ष के क्षेत्रों के नज़दीक मौजूद देशों ने तो इससे भी ज़्यादा सैन्य खर्च बढ़ाने की योजना बनाई है जैसे कि पोलैंड ने 2022 में GDP के 2.1 प्रतिशत के मुक़ाबले 2024 में इसे बढ़ाकर GDP का 3 प्रतिशत करने का एलान किया है. सैन्य खर्च में बढ़ोतरी की ये प्रतिबद्धताएं, जिन्हें ख़राब होती अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा स्थिति के संदर्भ में आवश्यक माना जाता है, कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरणीय प्रदूषण में सीधे रूप से योगदान देती हैं.
हथियार उद्योग ने लोगों की उम्मीदों और क़ानूनी बाध्यताओं को पूरा करन के लिए ESG (एनवायरमेंटल, सोशल एंड गवर्नेंस) रिपोर्टिंग को विकसित किया लेकिन इसे एक अलग ढंग से किया जाता है. हथियार उद्योग के द्वारा पर्यावरणीय CSR (कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) रिपोर्टिंग का विश्लेषण करने वाले कॉन्फ्लिक्ट एंड एनवायरमेंट ऑब्ज़र्वेटरी की लियोनी निम्मो ने पाया कि ऊर्जा, पानी और कूड़े की लगातार रिपोर्टिंग की रूप-रेखा की कमी इस क्षेत्र के भीतर की कंपनियों की तुलना मुश्किल बनाती है. इसके अलावा सेना के उपयोग के लिए सिंथेटिक एविएशन फ्यूल की संभावना को लेकर दावे विशाल वित्तीय एवं ऊर्जा लागत को नज़रअंदाज़ करते हैं. वैसे तो हथियार का उत्पादन करने वाले उत्तरोत्तर ESG आवश्यकता पर प्रतिक्रिया देते हैं लेकिन सेना के सार्वजनिक खर्च और पर्यावरण एवं जलवायु पर इसके वास्तविक असर को लेकर और ज़्यादा चर्चा की ज़रूरत है.

मुश्किल चुनौतियों के लिए बेशक जादुई समाधान नहीं है, फिर भी वैश्विक उथल-पुथल के समय में आक्रामक सैन्य व्यवहारों को रोकने, सैन्य खर्च सीमित करने और हरित बदलाव में निवेश को प्रेरित करने के लिए हमें सक्रिय रूप से समाधानों की तलाश करनी चाहिए.

रक्षा पर ज़्यादा खर्च के साथ एक अन्य समस्या, जो पूरी तरह इसकी गुप्त प्रकृति के कारण है, कई देशों में सार्वजनिक समीक्षा की संभावित अनुपस्थिति है. इसके कारण भ्रष्टाचार उत्पन्न करने वाली कार्यप्रणाली को बढ़ावा मिल सकता है और जलवायु वित्त एवं हरित परिवर्तन को लेकर प्रतिबद्धता में और कमी आ सकती है. इसके अलावा SIPRI ने भी कहा है कि ऐसा कोई व्यापक डेटाबेस नहीं है जो अलग-अलग सैन्य खर्च के आंकड़े को संकलित करता है. इस प्रकार सैन्य योजना में सैन्य खर्च और प्राथमिकताओं की संरचना ग़ायब है. इससे ये जोखिम काफ़ी ज़्यादा बना हुआ है कि भविष्य में ज़्यादा ख़तरे की वजह से जलवायु लचीलापन और हरित परिवर्तन की पहल को वैश्विक स्तर पर पर्याप्त फंड नहीं मिलेगा.

मानवीय सहायता के लिए पर्याप्त फंड की कमी बरकरार

इसके अलावा, सैन्य और सुरक्षा खर्च पर ध्यान केंद्रित करने के कारण अन्य वैश्विक प्राथमिकताओं को लगातार पर्याप्त फंड नहीं मिलेगा. वैसे तो कुल अंतर्राष्ट्रीय मानवीय सहायता धीरे-धीरे आंकड़ों में बढ़ रही है लेकिन लगभग 50 प्रतिशत मानवीय आवश्यकताएं पूरी नहीं हो पा रही हैं. डेवलपमेंट इनिशिएटिव के अनुसार 2020 और 2021 में कुल आवश्यकताओं में से 51 प्रतिशत और 53 प्रतिशत को पूरा किए जाने का अनुमान है. 2020 में फंड की आवश्यकता ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंचने के बाद उसमें मामूली कमी ही आई है. 2021 में तो मात्रा के हिसाब से फंड में दूसरी सबसे ज़्यादा कमी रही है. रक्षा और सुरक्षा पर खर्च में बढ़ोतरी की वजह से मानवीय सहायता के लिए फंड की कमी आने वाले वर्षों में और भी बढ़ने की उम्मीद है.
वैश्विक जलवायु कर: शांति के प्रयासों और जलवायु को लेकर पहल के बीच तालमेल कैसे बनाया जाए?
परंपरागत सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने और सैन्यीकरण में बढ़ोतरी के कारण अतिरिक्त कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरणीय प्रदूषण में महत्वपूर्ण रूप से इज़ाफ़ा हुआ है. लंबे समय में इससे जलवायु से जुड़ी नीतियों पर सार्वजनिक और निजी खर्च होना बंद हो सकता है या केवल समृद्ध भौगोलिक क्षेत्रों में ही निवेश केंद्रित हो सकता है.
इसलिए हमें एक व्यापक अंतर्राष्ट्रीय रूप-रेखा की ज़रूरत है जो सुरक्षा चुनौतियों यानी अंतर्राष्ट्रीय किरदारों को सशस्त्र संघर्षों में शामिल होने से रोके और सतत विकास लक्ष्यों (SDG) से जुड़ी उन परियोजनाओं के लिए वित्त प्रदान करे जिनके लिए पर्याप्त फंड नहीं है.
वैश्विक नेताओं के द्वारा चर्चा किए गए व्यापक साधनों में एक आर्थिक साधन के रूप में वैश्विक जलवायु कर पर विचार किया जाना चाहिए. चलिए हम बदलाव लाने में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और विकास फंड की शक्ति का उपयोग करने की संभावना तलाश करते हैं:
जो देश अंतर्राष्ट्रीय शांति के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं उन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा के द्वारा उसी रूप में निर्धारित किया जाना चाहिए.
अगर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रणाली में ऐसे पक्ष की भूमिका के कारण उसके साथ व्यापार से परहेज करना संभव नहीं है तो ऐसे व्यापार पर प्रभावशाली ढंग से कर लगाया जाना चाहिए. ऐसे कर को आक्रमणकारी देश से आने वाली संस्थाओं के ठेकेदारों पर बकाया रक़म के प्रतिशत के रूप में शुरू किया जा सकता है. इस तरह से जमा फंड को एक अंतर्राष्ट्रीय हरित विकास फंड में हस्तांतरित किया जाना चाहिए.
इस तरह का फंड हथियारों और सैन्य तकनीकों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर इसी तरह के कर से भी इकट्ठा किया जा सकता है.
भविष्य में रक्षा क्षेत्र के लिए पूरे विश्व में एक समान ESG रिपोर्टिंग सशस्त्र संघर्षों के साथ-साथ सैन्य उद्योगों के जलवायु पर असर को लेकर लोगों की जागरुकता में बढ़ोतरी कर सकती है. इसके परिणामस्वरूप ज़्यादा जलवायु तटस्थ तकनीकों और पद्धतियों को शुरू करने को लेकर लोगों का दबाव बढ़ा सकती है.
मुश्किल चुनौतियों के लिए बेशक जादुई समाधान नहीं है, फिर भी वैश्विक उथल-पुथल के समय में आक्रामक सैन्य व्यवहारों को रोकने, सैन्य खर्च सीमित करने और हरित बदलाव में निवेश को प्रेरित करने के लिए हमें सक्रिय रूप से समाधानों की तलाश करनी चाहिए. सफल आर्थिक समन्वय की नीतियों के अपने ट्रैक रिकॉर्ड के साथ G20 इन चुनौतियों का हल तलाशने में एक महत्वपूर्ण मंच बन सकता है. ऐसा नहीं होने पर इस बात का जोखिम है कि हम बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों के कारण जलवायु को लेकर प्रतिक्रिया देने में एक और दशक गंवा दें.