ग्लोबल साउथ में बहुपक्षीयवाद और आपदा प्रबंधन: G20 के लिए एक केस स्टडी

Sohini Bose | S. Nanthini

टास्क फोर्स 7: टूवर्ड्स रिफॉर्म्ड मल्ट्रीलैटरलिज़्म: ट्रांसफॉर्मिंग ग्लोबल इंस्टीट्यूशंस एंड फ्रेमवर्क्स


सार

आपदा जोख़िम को कम करना अब G20 के तहत सहयोग के क्षेत्रों का हिस्सा है. ये G20 के मौजूदा अध्यक्ष, भारत को एक अनोखा अवसर उपलब्ध कराता है. भारत आपदा प्रबंधन विकसित करने को लेकर अपने अनुभव का बहुपक्षीय स्तर पर लाभ उठाते हुए इस पहल को इसके प्रारंभिक चरण में आगे बढ़ा सकता है. बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी सेक्टोरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन के भीतर क्षेत्रीय आपदा प्रबंधन विकसित करते समय भारत ने जिन चुनौतियों का सामना किया है, वो अहम हैं. इसी तरह दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों के समूह आसियान जैसे ज़्यादा सक्रिय बहुपक्षीय संगठनों से भी आपदा जोख़िम से निपटने की क़वायदों से जुड़े सबक़ सीखे जा सकते हैं. ग्लोबल साउथ में आपदाओं की ज़द में रहने वाले इलाक़ों के ये अनुभव, G20 के लिए एक आदर्श केस स्टडी हैं. इस पॉलिसी ब्रीफ का उद्देश्य इस केस स्टडी का उपयोग करके आपदा जोख़िम कम करने पर G20 कार्य समूह के लिए प्रस्ताव तैयार करना है, ताकि वो अधिक प्रभावी ढंग से सहभागिता कर सके. प्रमुख रूप से ये सदस्य देशों के बीच बेहतरीन तौर-तरीक़ों को साझा करने के लिए एक तंत्र के विकास की सिफ़ारिश करता है।

  1. चुनौती

प्राकृतिक आपदाओं के ख़तरे राष्ट्रीय सीमाओं से परे जाते हैं, और जीवन और आजीविका पर असर डालते हैं. ऐसे ख़तरे, जलवायु परिवर्तन की शुरुआत के साथ और मज़बूत हो रहे हैं. यही वजह है कि दुनिया भर में समान विचारधारा वाले देशों के बीच आपदा प्रबंधन में साझेदारी एक आवश्यकता बनती जा रही है. भारत की G20 अध्यक्षता के तहत आपदा जोख़िम कम करने (DRR) से संबंधित क़वायदों को इस समूह के सहयोग के क्षेत्रों में जोड़ा गया है. हालांकि, बहुपक्षीय स्तर पर आपदा प्रबंधन विकसित करने की प्रक्रिया को कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. इन चुनौतियों में ख़तरे की अनियमित प्रकृति और इस प्रक्रिया में शामिल देशों की संप्रभुता शामिल हैं, जो सहयोग के मसलों को पेचीदा बना सकते हैं.

चूंकि भारत इस पहल को उसके प्रारंभिक चरण में आगे बढ़ा रहा है, लिहाज़ा उसे आपदा प्रबंधन में बहुपक्षीय सहयोग स्थापित करने के अपने अनुभवों का लाभ उठाना चाहिए. इसी सिलसिले में इस पॉलिसी ब्रीफ का उद्देश्य उन चुनौतियों की पहचान करना है जिनका सामना, ख़ासतौर से बंगाल की खाड़ी के क्षेत्रीय संगठन बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी सेक्टोरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन (बिम्सटेक)a के भीतर बहुपक्षीय आपदा प्रबंधन विकसित करने में भारत को करना पड़ा है. इसी तरह दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों के समूह यानी आसियानb जैसे अधिक सक्रिय क्षेत्रीय संगठन से इन बाधाओं को दूर करने के लिए सीखे जा सकने वाले सबक़ों का ख़ाका पेश किया गया है. बहुपक्षीय आपदा प्रबंधन विकसित करने की प्रक्रिया में ग्लोबल साउथ से सावधानियों और बेहतरीन तौर-तरीक़ों का ये समग्र समूह आपदा जोख़िम कम करने पर G20 कार्य समूह के लिए एक दिशानिर्देशक केस स्टडी के रूप में काम करेगा.

बंगाल की खाड़ी अपने उथल-पुथल भरे स्वभाव के लिए कुख्यात है और इसके तटवर्ती इलाक़ों में अक्सर चक्रवात कहर बरपाते रहते हैं. अंडमान-सुमात्रा सबडक्शन ज़ोनc से बंगाल की खाड़ी की निकटता, इस क्षेत्र को सुनामी के ख़तरों के प्रति असुरक्षित बना देती है. 1996 और 2015 के बीच इस क्षेत्र में आई आपदाओं में लगभग 317,000 लोगों की जान चली गई, 1.6 करोड़ लोग बेघर हो गए, और ज़बरदस्त आर्थिक नुक़सान दर्ज किया गया.[i] हालांकि, आपदाओं को लेकर इस स्तर की संवेदनशीलता और बिम्सटेक के लंबे अस्तित्व के बावजूद, आपदा प्रबंधन को लेकर एक क्रियाशील बहुपक्षीय प्रणाली बनाने के प्रयासों से कुछ ख़ास हासिल नहीं हुआ है.[ii] जिन चुनौतियों ने बिम्सटेक को बहुपक्षीय आपदा प्रबंधन को लेकर एक मज़बूत मंच के रूप में उभरने से रोका है वो इस प्रकार हैं:

जब तक कोई बहुत बड़ी आपदा ना घटे, प्रभावित समुदायों के लिए आपदाएं आम जीवन का हिस्सा बन जाती हैं. विश्व में प्राकृतिक आपदाओं के हिसाब से ज़्यादातर संवेदनशील क्षेत्रों (जैसे बंगाल की खाड़ी) की यही कहानी है. हालांकि, विशाल पैमाने वाली आपदाएं कभी-कभार ही घटित होती हैं, नतीजतन क्षेत्रीय स्तर पर आपदा तैयारियों को आगे बढ़ाने, या दीर्घकालिक और टिकाऊ आपदा प्रबंधन के लिए बहुपक्षीय रूपरेखा तैयार करने के प्रयास वक़्त के साथ सुस्त पड़ जाते हैं. इस तरह अल्पकालिक और अस्थायी कार्य संस्कृति पैदा हो जाती है, और क्षेत्रीय स्तर पर जोख़िम कम करने की क़वायदों के निर्माण के लिए सामूहिक रूप से ठोस पहल को प्राथमिकता नहीं दी जाती. ये हक़ीक़त, बिम्सटेक में ज़ाहिर होती है, जहां 2004 की सुनामी के बाद भले ही आपदा प्रबंधन पर उप-क्षेत्र को सहयोग के लिए अपनाया गया था, लेकिन दो साल के भीतर इसकी रफ़्तार धीमी होने लगी. जैसे-जैसे सुनामी की यादें धुंधली पड़ने लगीं, आपदा प्रबंधन का मसला पृष्ठभूमि में चला गया. ख़ासतौर से इसलिए क्योंकि यहां के सदस्य देश आपदा प्रबंधन पर किसी क़रार से बंधे नहीं थे.[iii] आगे चलकर गंभीर आपदाओं के घटित होने पर इस इलाक़े के देशों में द्विपक्षीय रूप से मानवतावादी सहायता और आपदा राहत (HADR)d जुटाने की आदत पड़ गई. इससे अल्प-कालिक और अस्थायी क़वायदों का दौर क़ायम रहा. इस तरह बिम्सटेक के भीतर दीर्घकालिक बहुपक्षीय DRR पहलों को अपनाए जाने की प्रक्रिया में रुकावटें आती चली गईं.

अल्पकालिक और अस्थायी क़वायदों के साथ-साथ आपदा प्रबंधन में ठोस बहुपक्षीय सहयोग के निर्माण में एक और चुनौती प्राकृतिक आपदाओं की अनियमित प्रकृति है. ज़बरदस्त मात्रा और आकार वाली प्राकृतिक आपदा की घटना, प्रभावित देशों को आपदा प्रबंधन और जोख़िम कम करने पर सामूहिक पहल करने के लिए प्रेरित करती है, लेकिन ये प्रयास आमतौर पर अस्थायी और अल्पकालिक होते हैं. ऐसे आकार और मात्रा वाली आपदाओं के बार-बार घटित ना होने के चलते, समय के साथ ऐसी पहलें अक्सर अपनी जीवंतता खो देती हैं. इतना ही नहीं, मौजूदा प्रयास अफ़सरशाही की दीर्घकालिक प्रक्रियाओं में उलझ जाते हैं, जिससे बहुपक्षीय पहल ठहराव की स्थिति में पहुंच जाती हैं. मिसाल के तौर पर बिम्सटेक के भीतर 2005 में आपदा प्रबंधन क्षेत्र को अपनाने के तुरंत बाद जीवंत पहलों की एक श्रृंखला शुरू की गई थी. इनमें मौसम और जलवायु परिवर्तन पर बिम्सटेक केंद्र का निर्माण (2005 में प्रस्तावित और 2014 में स्थापित), आपदा जोख़िम में कमी और प्रबंधन के लिए बिम्सटेक देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग पर एक कार्यशाला (2006), और प्रभावी क्षेत्रीय सहयोग के लिए कार्रवाई को लेकर एजेंडा तैयार करना (2006) शामिल हैं. बहरहाल, गतिविधियों की ऐसी भागदौड़ अल्पकालिक रही. जलवायु केंद्र की स्थापना एक लंबी प्रक्रिया साबित हुई और अन्य प्रासंगिक क्षेत्रीय संस्थानों के साथ सहयोग करने का इसका प्रारंभिक उद्देश्य अधूरा रह गया है.[iv] निरंतर प्रोत्साहन नहीं मिलने के कारण आपदा प्रबंधन में सहयोग से जुड़ा बिम्सटेक का दायरा बहुत सीमित रहा है.e G20 के लिए, जलवायु परिवर्तन के बारे में बढ़ती जागरूकता के अलावा, कोविड-19 महामारी ने आपदा जोख़िम कम करने की क़वायदों में सहयोग शुरू करने को लेकर तात्कालिकता से भरपूर प्रोत्साहन के रूप में कार्य किया है. लिहाज़ा, उसे ये सुनिश्चित करना होगा कि महामारी के बाद के कालखंड में DRR को लेकर उसकी बहुपक्षीय पहल, समय के साथ धीमी ना पड़ती चली जाए.

आपदा प्रबंधन पर किसी भी बहुपक्षीय सहभागिता की कामयाबी के लिए सदस्य देशों के बीच ज्ञान और बेहतरीन अभ्यासों को साझा करना निहायत ज़रूरी हो जाता है. हालांकि, कई वजहों के चलते व्यक्तिगत तौर पर हरेक सदस्य राष्ट्र के बेहतरीन तौर-तरीक़ों का अक्सर उपयोग नहीं किया जाता है. इन वजहों में क्षेत्रीय प्रोत्साहन की कमी, अंतर-देशीय संबंधों में जटिलताएं या बहुपक्षीय व्यवस्था में किसी एक देश का दबदबा शामिल हैं. ऐसे हालात, क्षेत्रीय स्तर पर ना केवल विशेषज्ञता बल्कि संसाधनों के संग्रह के निर्माण को भी रोक देते हैं, जिससे बहुपक्षीय DRR प्रणाली के प्रभावी कामकाज में अड़चनें आती हैं. बिम्सटेक के संदर्भ में सदस्य देशों के बीच ज्ञान साझा करने के प्रयास बेहद कम और काफ़ी अंतरालों भरे रहे हैं. उदाहरण के लिए, 2006 में एक शुरुआती कार्यशाला के बाद अगली कार्यशालाएं 2019 और उसके बाद से ही आयोजित की गईं.f [v] 2006 की कार्यशाला में सदस्य देशों द्वारा आपदा प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर प्रस्तुतियां दी गई थीं. इसके बाद मई 2022 में आयोजित आपदा प्रबंधन सहयोग पर बिम्सटेक विशेषज्ञ समूह की पहली बैठक में जाकर ही सबकी विशेषज्ञता को मिलाकर, क्षेत्र में आपदा तैयारियों में सुधार के लिए एक कार्य योजना तैयार करने पर सहमति बन पाई.[vi]

चूंकि, असुरक्षित और कमज़ोर समुदाय ही अक्सर सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं और किसी भी आपदा पर प्रतिक्रिया देने वाले पहले ज़मीनी किरदार होते हैं, लिहाज़ा उन्हें आपदा प्रबंधन की प्रक्रिया में शामिल करना महत्वपूर्ण है. हालांकि, क्षेत्रीय स्तर पर आपदा प्रबंधन से जुड़ी पहल, अक्सर सरकारी अधिकारियों और सशस्त्र बलों के स्तर तक ही सीमित रहती है, और इसमें प्रयोगों और व्यावहारिक अनुभव पर आधारित ग़ैर सरकारी संगठनों के अनुभव या शिक्षा जगत और निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता शामिल नहीं होती है. बहुस्तरीय जुड़ाव का ऐसा अभाव, आपदा जोख़िम में कमी लाने की क़वायदों से जुड़ी संस्कृति को इस क्षेत्र में जड़ें जमाने से रोकता है, और ज़मीन पर बहुपक्षीय पहल की प्रभावशीलता कमज़ोर पड़ जाती है. बिम्सटेक की पहलें सरकारी स्तर तक सीमित रखी गई हैं, और इस दिशा में तमाम क़वायदें सशस्त्र बलों द्वारा की जाती हैं. स्वाभाविक रूप से, आपदा तैयारियों में बिम्सटेक द्वारा किए गए प्रयास ज़मीन पर नहीं उतरे हैं. बिम्सटेक विकास कोष के लिए वित्तीय विशेषज्ञों की बैठक (2022)[vii] या बिम्सटेक पर काम करने वाले थिंक टैंकोंg के बीच की मीटिंग हालिया घटनाक्रम हैं.

ऐसी स्थितियों में जहां आपदा प्रभावित देश अपनी संप्रभुता को लेकर संवेदनशील होते हैं (जैसे बंगाल की खाड़ी के क्षेत्र में), वो अक्सर मददगार राष्ट्रों (जिनको लेकर वो आशंकित रहते हैं) के सशस्त्र बलों द्वारा दी जाने वाली मानवतावादी सहायता और आपदा राहत को नामंज़ूर कर देते हैं. संप्रभुता के प्रति ऐसी संवेदनशीलता, इन देशों को बहुपक्षीय संगठन के सदस्यों के रूप में एकीकृत क्षेत्रीय आपदा प्रबंधन बल बनाने को लेकर अपने सशस्त्र सैनिकों को एकजुट करने से भी रोकती है. हालांकि, किसी ख़ास देश की क़वायद नहीं रहने वाली एक बहुपक्षीय एजेंसी से संकट के समय मानवतावादी सहायता और आपदा राहत के अधिक स्वीकार्य होने की संभावना है. ख़ुद बहुपक्षीय संगठन के लिए इस तरह का आपदा प्रतिक्रिया बल, सदस्य राष्ट्रों के बीच परस्पर निर्भरता को मज़बूत करने में मदद करेगा और इस तरह आपदा तैयारियों के अपने प्रयासों को भी बढ़ावा देगा.

ये संवेदनशीलता बिम्सटेक देशों में ज़ाहिर होती है, क्योंकि अब भी संकट की स्थिति में इसके सदस्य इस क्षेत्रीय संगठन के दायरे से बाहर द्विपक्षीय सहायता पर निर्भर रहते हैं. स्वाभाविक रूप से, आपदा प्रतिक्रिया बल के बग़ैर बिम्सटेक, बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में होने वाली किसी भी प्राकृतिक आपदा का जवाब देने में सक्षम नहीं रहा है.

आपदा प्रबंधन की बहुपक्षीय प्रणाली तैयार करने में बिम्सटेक के सामने आने वाली ये सारी चुनौतियां G20 के लिए एहतियाती सबक़ हैं. ज़ाहिर तौर पर G20 को भी आपदा जोख़िम कम करने से जुड़ी क़वायदों के लिए अपनी प्रणाली को व्यवस्थित करने में तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. जैसे-जैसे जलवायु संकट गहराता जा रहा है, दुनिया भर में सक्रिय आपदा प्रबंधन की संस्कृति की शुरुआत करने में G20 द्वारा अहम भूमिका निभाने की ज़रूरत बढ़ती जा रही है.

  1. G20 की भूमिका

G20 के अनेक देश प्राकृतिक आपदाओं के प्रति नाज़ुक और संवेदनशील हैं. समूह के पांच सदस्य देशों के नाम 2022 के विश्व आपदा जोख़िम सूचकांक में आए हैं. इस सूचकांक में सबसे ज़्यादा आपदा जोख़िम वाले 15 देशों की सूची शामिल है (टेबल 1 देखें).

चित्र 1: दुनिया भर में सबसे ज़्यादा आपदा जोख़िम वाले देशों का आपदा जोख़िम सूचकांक (2022)

देश आपदा जोख़िम स्कोर
फिलीपींस 46.82
भारत 42.31
इंडोनेशिया 41.46
श्रीलंका 38.37
मेक्सिको 37.55
म्यांमार 35.49
मोज़ाम्बिक 34.37
चीन 28.7
बांग्लादेश 27.9
पाकिस्तान 26.75
रूस 26.54
वियतनाम 25.85
पेरू 25.41
सोमालिया 25.07
यमन 24.26

 

नोट: इस सूची में G20 के पांच सदस्य देशों को रेखांकित किया गया है.

स्रोत: “2022 में दुनिया भर में सबसे ज़्यादा आपदा जोख़िम वाले देश,” स्टैटिस्टा 2023.[viii]

G20 के सदस्य देशों में से दो (जापान और भारत) को 2019 में जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित 10 देशों की सूची में भी स्थान दिया गया था (टेबल 2 देखें).

चित्र 2: 2019 में सबसे ज़्यादा प्रभावित 10 देशों का जलवायु जोख़िम सूचकांक

देश जलवायु जोख़िम स्कोर
मोज़ाम्बिक 2.67
ज़िम्बाब्वे 6.17
बहामास 6.5
जापान 14.5
मलावी 15.17
अफ़ग़ानिस्तान 16
भारत 16.67
दक्षिण सूडान 17.33
नाइजीरिया 18.17
बोलिविया 19.67

 

नोट: इस सूची में G20 के दो सदस्य देशों को रेखांकित किया गया है.

स्रोत: वैश्विक जलवायु जोखिम सूचकांक 2019: जर्मन वॉच.[ix]

स्वाभाविक रूप से, अपने क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं के जोख़िम को कम करने और जलवायु संरक्षण सुनिश्चित करने को लेकर इन देशों में जागरूकता बढ़ रही है. 2023 जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक[x], G20 देशों के जलवायु संरक्षण प्रदर्शन को इस प्रकार दर्जा देता है: उच्च – भारत, यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी; मध्यम- यूरोपीय संघ, मिस्र, स्पेन, इंडोनेशिया, फ्रांस, इटली, मैक्सिको, न्यूज़ीलैंड; निम्न- ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका, तुर्किए, अर्जेंटीना; और बहुत निम्न— जापान, चीन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, रूस, दक्षिण कोरिया और सऊदी अरब.

G20 के सभी सदस्य देश आपदा जोख़िम कम करने पर सेंदाई फ्रेमवर्क का भी पालन करते हैं.h इसके अलावा, महामारी के विनाशकारी प्रभाव से सबक़ लेते हुए इस प्रतिबद्धता ने G20 के तहत सहयोग के एक क्षेत्र के रूप में आपदा जोख़िम कम करने की क़वायदों को अपनाया और इसने एक कार्य समूह के गठन का रूप ले लिया. बेशक़, संयुक्त राष्ट्र ने पहले ही कहा था: “हमें जलवायु परिवर्तन और अन्य आपदा जोख़िमों के ख़िलाफ़ दीर्घकालिक विकास की रक्षा के लिए अभी से निवेश शुरू करने की दरकार है. इसे हासिल करने के लिए दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का समर्थन अपरिहार्य है.”[xi]

इस सिलसिले में कार्य समूह कई योजनाओं पर चर्चा कर रहा है. इन क़वायदों में बेहद शुरुआती दौर में चेतावनी देने वाली प्रणालियों का वैश्विक कवरेज तैयार करना, आपदा प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे खड़े करना, मज़बूत वित्तीय ढांचे बनाना, आपदा प्रतिक्रिया प्रणालियां निर्मित करना और DRR के लिए पारिस्थितिक तंत्र-आधारित दृष्टिकोण का बढ़ता प्रयोग शामिल हैं. इसका इरादा, सेंदाई फ्रेमवर्क की मध्यावधि समीक्षा के लिए विचारों को शामिल करना, आपदा जोख़िम कम करने से संबंधित भविष्य की वैश्विक नीतियों और पहलों को जागरूक करना और सभी स्तरों पर बहुपक्षीय सहयोग को नया रूप देना है.[xii] इस क़वायद में, ग्लोबल साउथ (जो आपदाओं के प्रति बेहद संवेदनशील है) से बहुपक्षीय आपदा प्रबंधन के निर्माण में सावधानियों और बेहतरीन तौर-तरीक़ों का एक समग्र अध्ययन G20 के लिए ज़रूरी हो जाता है.

  1. G20 के लिए सिफ़ारिशें

2004 की हिंद महासागर सुनामी आधुनिक इतिहास की सबसे घातक आपदाओं में से एक थी. इसने हिंद महासागर क्षेत्र में आपदा प्रबंधन पर पुनर्विचार को प्रेरित किया. सुनामी ने आपदा प्रबंधन में बिम्सटेक की भागीदारी को बढ़ावा दिया, और आपदा प्रबंधन को लेकर आसियान की मौजूदा बहुस्तरीय प्रणाली के लिए भी उत्प्रेरक साबित हुआ. इस प्रणाली में स्थानीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय किरदार शामिल हैं. वैसे तो आसियान की समग्र क्षेत्रीय आपदा प्रबंधन संरचना में अब भी सुधार की काफ़ी गुंजाइश बची है, फिर भी ये G20 के लिए शुरुआती बिंदु के रूप में काम कर सकता है. आसियान का ये ढांचा, G20 समूह के बहुपक्षीय आपदा प्रबंधन संरचनाओं के विकास के लिए एक संदर्भ के रूप में कार्य कर सकता है.

बहरहाल, संभावित समस्याओं के बारे में जागरूक होना, उतना ही अहम है जितना बेहतरीन तौर-तरीक़ों को हासिल करना. इसी के अनुसार, बहुपक्षीय आपदा प्रबंधन पर निम्नलिखित सिफ़ारिशें दी गई हैं, जो बिम्सटेक के सामने आने वाली चुनौतियों और आसियान से संबंधित सबक़ पर आधारित हैं. इसका मक़सद आपदा जोख़िम कम करने पर G20 कार्य समूह को अधिक प्रभावी ढंग से सहयोग करने में मदद करना है.

G20 के ज़रिए सामूहिक DRR का रास्ता साफ़ करने के लिए औपचारिक रूप से एक समझौता तैयार करने की दरकार है. इस समझौते को बहुपक्षीय जुड़ाव के लिए रीढ़ की हड्डी के रूप में काम करना होगा. आपदाओं की तीव्रता और बारंबारता (फ्रीक्वेंसी) में तेज़ी से बढ़ोतरी हो रही है, और ये अक्सर सीमाओं के आर-पार प्रभाव पैदा करते हैं. ऐसे में अल्प-कालिक और अस्थायी द्विपक्षीय अभ्यास (जैसा कि बिम्सटेक क्षेत्र में मौजूद है), अब आपदाओं के प्रबंधन में शायद उतने प्रभावी नहीं रहेंगे. नतीजतन, अधिक संस्थागत दृष्टिकोण ज़रूरी हो जाता है. G20 की तिकड़ी- जिसमें फ़िलहाल इंडोनेशिया, भारत और ब्राज़ील शामिल हैं- सेंडाई फ्रेमवर्क[xiii] द्वारा निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए एक साथ आई थी. इसी तिकड़ी द्वारा इस समझौते को तैयार करने में अग्रणी भूमिका निभाए जाने की दरकार है.

मिसाल के तौर पर, दक्षिण पूर्व एशिया में आपदा प्रबंधन और आपातकालीन प्रतिक्रिया पर आसियान समझौता (AADMER), क्षेत्र के आपदा प्रबंधन इकोसिस्टम की बुनियाद तैयार करता है. दक्षिण पूर्व एशिया के आपदा प्रबंधन अभ्यासों को इस तरह से औपचारिक रूप देकर, आसियान संगठन इस क्षेत्र में आपदाओं के लिए सामूहिक प्रतिक्रिया को संस्थागत बनाने में सक्षम हुआ है. जिसके नतीजतन इसके आपदा प्रबंधन तंत्रों के स्थायित्व और टिकाऊपन में वृद्धि हुई है.

ये सुनिश्चित करने के लिए कि G20 के आपदा जोख़िम कम करने के उपाय तेज़ी से बदलते जोख़िम परिदृश्य के अनुसार उभरते रहें, समूह को ये सुनिश्चित करना होगा कि उसकी पहल व्यापक वैश्विक आपदा प्रबंधन ढांचे और प्रोटोकॉल में शामिल हो. ये G20 को न केवल अपनी विभिन्न पहलों पर नज़र रखने में सक्षम करेगा, बल्कि विशिष्ट प्राथमिकताओं, परिणामों और लक्ष्यों के साथ वैश्विक आपदा प्रबंधन इकोसिस्टम में भी योगदान देगा. इसके अलावा ये उस रफ़्तार को क़ायम रखेगा जो G20 DRR कार्य समूह के निर्माण से पैदा हुई थी.

उदाहरण के तौर पर, आसियान की आपदा-संबंधी पहलों के तार AADMER से जुड़े हैं और इसलिए उन्हें एक व्यापक क्षेत्रीय ढांचे में ‘जोड़’ दिया गया है.[xiv] इतना ही नहीं, आपदा प्रबंधन पर वैश्विक संवाद के साथ तालमेल सुनिश्चित करने के लिए, इस दस्तावेज़ में आपदा प्रबंधन से संबंधित प्रासंगिक वैश्विक समझौते भी शामिल किए गए हैं. इनमें सेंदाई फ्रेमवर्क शामिल है.[xv] इसी प्रकार, आपदा प्रबंधन पर मौजूदा और भावी वैश्विक प्रोटोकॉल के साथ अनुकूलता लाने के लिए G20 में इस तरह का प्रावधान, ना केवल इसके सदस्यों से, बल्कि अन्य भागीदारों से भी लेन-देन सुनिश्चित करेगा.

सदस्य देशों के बीच ज्ञान, सूचना या तकनीकी जानकारी साझा करना, बहुपक्षीय संगठनों के लिए एक अहम तौर-तरीक़ा है. G20 ने DRR कार्य समूह की स्थापना की है, जिसका मक़सद “G20 द्वारा सामूहिक कार्य को प्रोत्साहित करना, अनेक विषयों में शोध करना और आपदा जोख़िम कम करने पर बेहतरीन तौर-तरीक़ों का आदान-प्रदान करना” है.[xvi] इस संदर्भ में एक ऐसे तंत्र की आवश्यकता है जिसके ज़रिए सदस्य राष्ट्र, ज्ञान साझा करने के लिए मिलकर काम कर सकें. इस तंत्र से G20 को बेहद शुरुआती दौर में चेतावनी देने वाली प्रणालियों की वैश्विक कवरेज से जुड़ी अपनी प्राथमिकताओं पर आगे बढ़ने में मदद मिलेगी. इस तरह बुनियादी ढांचा प्रणालियों को आपदा के हिसाब से अधिक लचीला बनाया जा सकेगा और राष्ट्रीय DRR के मज़बूत वित्तीय ढांचे तैयार करने में मदद मिलेगी.

आसियान के भीतर आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक (ADMM) और ADMM प्लस जैसे तंत्रों के ज़रिए ज्ञान साझा किया जाता है.i ये तमाम तंत्र, आसियान सदस्य देशों और उनके संवाद भागीदारों के बीच व्यावहारिक सहयोग के लिए एक प्रभावी मंच के रूप में कार्य करते हैं.[xvii] कार्य समूहों के माध्यम से आसियान के सदस्य देशों की सेनाएं, मानवीय प्रतिक्रियाओं को सहारा देने के लिए रसद, बुनियादी ढांचे के निर्माण और परिवहन के साथ-साथ राहत वस्तुओं के वितरण जैसे क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट क्षमताओं का लाभ उठाने के लिए मिलकर काम करने में सक्षम हुई हैं. 

सरकार और सेना के अलावा, सिविल सोसाइटी के किरदार, शिक्षाविद, निजी क्षेत्र और स्थानीय समुदाय भी बहुपक्षीय आपदा प्रबंधन को सुविधाजनक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ऐसे में, शांति काल में नागरिक-सैन्य संबंधों में सहयोग विकसित किए जाने की आवश्यकता है ताकि वे मानवीय रूप से आपात परिस्थितियों के समय एक-दूसरे के साथ संवाद बनाने में सक्षम हो सकें. इन किरदारों के बीच सहकारी संबंध में कई विशेषताएं हैं. इनमें एक किरदार से दूसरे तक जानकारी संचारित करने की क्षमता के साथ-साथ इस क्षमता का उपयोग करके एक-दूसरे के साथ काम करने की क़वायद शामिल है. आसियान, नागरिक-सैन्य तालमेल के लिए कोई अजनबी नहीं है, जैसा कि आसियान स्टैंडबाय अरेंजमेंट्स फॉर डिज़ास्टर रिलीफ एंड इमरजेंसी रिस्पॉन्स यानी SASOP में उसके समावेश से ज़ाहिर होता है. AADMER द्वारा स्थापित SASOP, सदस्य राष्ट्रों को साझा आपदा कार्रवाइयों के लिए प्रक्रियाएं उपलब्ध कराता है, जिनमें “सैन्य और नागरिक परिसंपत्तियों और क्षमताओं की सुविधा और उपयोग” शामिल हैं.[xviii]

वैसे तो आपदा जोख़िम कम करने से जुड़ा संयुक्त राष्ट्र कार्यालय पहले से ही G20 DRR कार्य समूह का समर्थन कर रहा है, लेकिन इसमें राष्ट्रीय और स्थानीय सिविल सोसाइटी समूहों को भी शामिल करने की आवश्यकता है. दक्षिण पूर्व एशिया के AADMER साझेदारी समूह के समान नागरिक समाज को शामिल करने वाला तंत्र, G20 और स्थानीय समुदायों के बीच एक पुल के रूप में कार्य करेगा, जिससे ज़मीन पर ज़्यादा से ज़्यादा ज्ञान सुनिश्चित हो सकेगा.[xix]

ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और भारत समेत G20 के अनेक देशों में आपदाओं के बढ़ने का ख़तरा है. ऐसे में सदस्य देशों के लिए क्षेत्रीय मानवतावादी किरदारों के रूप में अपनी भूमिका को और अधिक परिभाषित करने की दरकार है. विशेष रूप से एक प्रतिक्रिया बल के संदर्भ में ये क़वायद बेहद अहम हो जाती है. हालांकि, ऐसे बल का निर्माण करते समय संप्रभुता से जुड़ी संवेदनशीलताओं के मसले को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है. सदस्य देशों की सेनाओं को अपनी राष्ट्रीय पहचान बरक़रार रखते हुए बहुपक्षीय प्रतिक्रिया के हिस्से के रूप में काम करने में सक्षम होना चाहिए. राष्ट्रीय और वैश्विक आपदा प्रतिक्रिया प्रणाली को मज़बूत करने को लेकर अपने उद्देश्य पर काम करते वक़्त G20 को इस बात का ख़ास तौर से ध्यान रखना चाहिए.[xx]

इस संदर्भ में, एक आसियान, एक प्रतिक्रिया नीति के अनुसार आसियान अपने सदस्य देशों को आपदा प्रतिक्रिया कार्यों के दौरान संबंधित देश के राष्ट्रीय ध्वज के साथ-साथ आसियान के झंडे, दोनों का उपयोग करते हुए सहायता पहुंचाता है. आपदा संचालन के दौरान ‘एक आसियान’ प्रतिक्रिया बनाए रखते हुए भी, प्रभावी रूप से ये क़वायद, आसियान के हरेक सदस्य देश की संप्रभुता की पुष्टि करता है.[xxi]


एट्रिब्यूशन: सोहिनी बोस और एस. नानथिनी, मल्टीलैटरलिज़्म एंड डिज़ास्टर मैनेजमेंट इन द ग्लोबल साउथ: ए केस स्टडी फॉर द G20,” T20 पॉलिसी ब्रीफ, जून 2023.


a भारत बिम्सटेक के आपदा प्रबंधन उप-क्षेत्र की अगुवाई करता है.

b चूंकि आसियान, बिम्सटेक के निकट स्थित है, लिहाज़ा वो उसकी कुछ भौगोलिक कमज़ोरियों को साझा करता है, जिससे बिम्सटेक के लिए आपदा प्रबंधन की अपनी बहुपक्षीय प्रणाली से सबक़ सीखना सरल हो जाता है.

c अंडमान-सुमात्रा सबडक्शन ज़ोन, सुंडा सबडक्शन ज़ोन का सबसे उत्तरी हिस्सा है. भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के हिलने-डुलने के कारण ये विश्व स्तर पर भूकंपीय रूप से सबसे ज़्यादा सक्रिय क्षेत्रों में से एक बन गया है.

d मानवीय मदद और आपदा राहत (HADR), वो सहायता है जो किसी एजेंसी (आमतौर पर सरकार) द्वारा आपदा के पीड़ितों को प्रदान की जाती है. आमतौर पर, इसमें तलाशी और बचाव अभियान चलाना, और भोजन, कपड़े और दवाओं के रूप में राहत सहायता प्रदान करना शामिल है.

e आपदा प्रबंधन में बिम्सटेक अभ्यास (2017, 2020 और 2021 में आयोजित) हालिया रुझान है, और इसकी उत्पत्ति इसके तटीय राष्ट्रों के बीच ख़ुद का दोबारा जुड़ाव बनाने की राजनीतिक दिलचस्पी के कारण हुई है. विशेष रूप से बंगाल की खाड़ी के बढ़ते रणनीतिक महत्व को देखते हुए ऐसी क़वायद की जा रही है. फिर भी, इन अभ्यासों को अभी नियमित किया जाना बाक़ी है.

f जोख़िम की सूचनाओं से लैस शहरी प्लानिंग पर एक बिम्सटेक कार्यशाला 2019 में आयोजित की गई थी, और 2021 में कोविड​​​​-19 के दौरान आपदा जोख़िम प्रशासन पर बिम्सटेक देशों के लिए एक और कार्यशाला का आयोजन किया गया. हाल ही में शुरू हुआ बिम्सटेक आपदा प्रबंधन अभ्यास, ज्ञान साझा करने के लिए एक मंच भी प्रदान करता है.

g बिम्सटेक पर काम कर रहे थिंक टैंकों के बीच आदान-प्रदान, स्वतंत्र थिंक टैंकों द्वारा आयोजित किया गया है. मिसाल के तौर पर RIS (विकासशील देशों के लिए अनुसंधान और सूचना प्रणाली) भारत ने पॉलिसी थिंक टैंकों के बिम्सटेक नेटवर्क की स्थापना की. अब तक पांच संस्करण आयोजित किए जा चुके हैं; 2010, 2015, 2017, 2018 और 2020. विवेकानन्द इंटरनेशनल फाउंडेशन, भारत ने 2018 और 2019 में क्षेत्रीय सुरक्षा पर बिम्सटेक थिंक टैंक डायलॉग का भी आयोजन किया है.

h आपदा जोख़िम कम करने के लिए सेंडाई फ्रेमवर्क (2015-2030) अपने हस्ताक्षरकर्ताओं को विकास लाभ को आपदाओं के जोख़िम से बचाने के लिए ठोस कार्रवाई उपलब्ध कराता है.

i ADM प्लस, आसियान और उसके 8 संवाद भागीदारों- ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण कोरिया, रूस और अमेरिका (जिन्हें सामूहिक रूप से ‘प्लस’ कहा जाता है) के मंच को कहते हैं. इस मंच का मक़सद इस क्षेत्र में शांति, स्थिरता और विकास के लिए सुरक्षा और रक्षा सहयोग को मज़बूत करना है.

 

Endnotes


[i] Ministry of Home Affairs, Government of India.

 

[ii] Sohini Bose, “BIMSTEC and Disaster Management: Future Prospects for Regional Cooperation,” Issue Brief no. 383, July 20, 2020, Observer Research Foundation.

 

[iii] Bose, “BIMSTEC and Disaster Management: Future Prospects for Regional Cooperation”

 

[iv] David Brewster et al., Australia-India Indo-Pacific Oceans Initiative: Regional collaborative arrangements in marine ecology in the Indo-Pacific, Canberra, Australian National University, July 2022.

 

[v] United Nations Office for Disaster Risk Reduction and Gujarat Institute of Disaster Management, Handbook on risk informed urban planning for BIMSTEC Member Countries, December 17-20, 2019, Gandhinagar, Gujarat Institute of Disaster Management, 2019.

 

[vi]BIMSTEC Expert Group agrees to develop the Plan of Action to improve Preparedness and Coordination for responding to Natural Disasters in the Region,” BIMSTEC, May 12, 2022.

 

[vii]Financial experts from BIMSTEC Member States meet to discuss the establishment of the BIMSTEC Development Fund,” BIMSTEC, December 19, 2022.

 

[viii]Countries with the highest disaster risk worldwide in 2022,” Statista 2023, accessed May 12, 2022.

 

[ix]The ten most affected countries in 2019,” Global Climate Risk Index: German Watch, 2019, accessed May 12, 2022.

[x] Jan Burck, Thea Uhlich, Christoph Bals, Niklas Höhne and Leonardo Nascimento, Climate Change Performance Index, Germany, Climate Action Network, German Watch and New Climate Institute, November 14, 2022, 7.

 

[xi] Mami Mizutori, “Statement on the establishment of a G20 Working Group on Disaster Risk Reduction,” United Nations Office for Disaster Risk Reduction, January 12, 2023.

 

[xii]  G20.

 

[xiii]  Ministry of Home Affairs, Government of India.

 

[xiv] ASEAN, ASEAN Agreement on Disaster Management and Emergency Response (AADMER) Work Programme 2016-2020, Semarang, ASEAN Secretariat, April 2016.

 

[xv] ASEAN, ASEAN Agreement on Disaster Management and Emergency Response (AADMER) Work Programme 2021-2025, Jakarta, ASEAN Secretariat, December 2020,

[xvi]Disaster Risk Reduction Working Group”, G20 India 2023, accessed May 13, 2022.

 

[xvii]About ADMM Plus,” ASEAN Defence Minister’s Meeting, January 10, 2023.

 

[xviii] ASEAN, Standard Operating Procedure for Regional Standby Arrangements and Coordination of Joint Disaster Relief and Emergency Response Operations, Jakarta, ASEAN Coordinating Centre for Humanitarian Assistance on disaster management, accessed May 23, 2023.

 

[xix] Carla Budiarto, “AADMER Partnership Group (APG),The Column, ASEAN Coordinating Centre for Humanitarian Assistance on disaster management, accessed May 20, 2023.

 

[xx] Ministry of Home Affairs, Government of India.

[xxi] ASEAN, Declaration on One ASEAN, One Response, Lao PDR, ASEAN Coordinating Centre for Humanitarian Assistance on disaster management, September 06, 2016.