बदलाव के लिए ज़ोर: जलवायु अनुकूल स्वस्थ शहरों के निर्माण का आह्वान

G20 शहरी योजना की प्रक्रिया में निरंतरता को जोड़कर जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करने में मदद कर सकता है.
Veenapani Rajeev Verma | Rajeev Sadanandan

 

जब से पर्यावरण पर मानवीय गतिविधियों के असर की शुरुआत हुई है, तब से तेज़ शहरीकरण ने धरती की सेहत के लिए काफ़ी जोख़िम खड़ा किया है. ख़राब नियोजन और डिज़ाइन से इस जोख़िम में और बढ़ोतरी होती है. जब 1972 में विकास की हद (लिमिट्स टू ग्रोथ) रिपोर्ट प्रकाशित हुई तो इसने बड़ी मात्रा में आर्थिक गतिविधि, जो काफ़ी हद तक शहरी क्षेत्र में होती थी, की वजह से जैव क्षमता एवं पारिस्थितिकी को लेकर चेतावनी जारी की. इस रिपोर्ट की आधी सदी के बाद अनियोजित शहरी विकास ने सामाजिक-आर्थिक-पर्यावरणीय समस्या को बढ़ा दिया है. वर्ल्ड सिटीज़ रिपोर्ट के अनुसार सिटी और शहरी इलाक़े का कुल ग्रीनहाउस गैस में लगभग 70 प्रतिशत योगदान है. दुनिया भर में केवल 12 प्रतिशत शहर ही प्रदूषण नियंत्रण के लक्ष्य तक पहुंच पाते हैं जबकि 10 में से 9 लोग बेहद प्रदूषित हवा में सांस लेते हैं. शहरी क्षेत्र हर साल 2.01 अरब टन सॉलिड वेस्ट का उत्पादन भी करते हैं जिसमें 2050 तक 70 प्रतिशत और बढ़ोतरी होने की आशंका है. बदलते संदर्भ में ये उपयुक्त है कि दुनिया भर में जलवायु कार्रवाई और अनुकूलता को एक शहरी दृष्टिकोण से आगे बढ़ाया जाए. 

 

वर्ल्ड सिटीज़ रिपोर्ट के अनुसार सिटी और शहरी इलाक़े का कुल ग्रीनहाउस गैस में लगभग 70 प्रतिशत योगदान है. दुनिया भर में केवल 12 प्रतिशत शहर ही प्रदूषण नियंत्रण के लक्ष्य तक पहुंच पाते हैं जबकि 10 में से 9 लोग बेहद प्रदूषित हवा में सांस लेते हैं.

 

विश्व स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में G20 देशों का योगदान लगभग 80 प्रतिशत है और सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक के रूप में ये G20 का कर्तव्य है कि वो जलवायु संकट पर जवाब दे. जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने और धरती की सेहत को सुधारने के लिए G20 ने जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते और संयुक्त राष्ट्र के द्वारा सतत विकास के लिए 2030 के एजेंडे को अपनाया है. G20 के इकोसिस्टम के भीतर C40 सिटीज़ एवं यूनाइटेड सिटीज़ एंड लोकल गवर्नमेंट्स (UCLG) द्वारा संचालित अर्बन 20 नाम के एक औपचारिक भागीदारी समूह की शुरुआत की गई है ताकि सामूहिक तौर पर G20 देशों के शहरों के सतत विकास को लेकर सामूहिक रूप से महत्वपूर्ण शहरी संवाद को बढ़ाया जा सके. लेकिन प्रतिबद्धता के बावजूद जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करने की G20 की कोशिशें डगमगा रही हैं. 

स्वस्थ शहर और जलवायु लक्ष्य मिलती-जुलती चीज हैं

 

पिछले दिनों सतत विकास लक्ष्य 3 (सभी के लिए स्वास्थ्य), 11 (शहरों और मानवीय बस्ती को समावेशी, सुरक्षित, अनुकूल एवं सतत बनाना) और 13 (जलवायु कार्रवाई) के बीच अटूट संपर्कों में स्पष्ट रुचि देखी गई है. अर्बन 20 की विज्ञप्ति में भी G20 के नेताओं से सुरक्षित, सतत और स्वस्थ शहरों के निर्माण का अनुरोध किया गया है. लेकिन जलवायु परिवर्तन पर अधिकतर संवाद ‘जलवायु न्यूनीकरण’ से बाधित हैं और दूसरे क्षेत्रों के साथ जटिल प्रणाली और संपर्कों को नज़रअंदाज़ करते हैं. किसी व्यक्ति या समावेशी, न्यायसंगत और सतत सेहतमंद शहर के समग्र स्वास्थ्य और कल्याण की अनुरूपता उसी तरह की व्यवहारवादी, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं पारिस्थितिकीय निर्धारकों से प्रभावित होती है. एक सेहतमंद शहर का दृष्टिकोण पर्यावरणीय निरंतरता में एक उत्प्रेरक की भूमिका निभा सकता है क्योंकि स्वस्थ शहर बनाने के लिए कार्रवाई के कई क्षेत्र मानवीय एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य को सुधारने से जुड़े हुए हैं. 

खपत और पर्यावरण: शुरुआत घर से होती है

 

खाद्य, पानी, ऊर्जा की घरेलू खपत और परिवहन से पर्यावरण पर काफ़ी दबाव पड़ता है. वैश्विक स्तर पर घरों में लगभग तीन-चौथाई कार्बन उत्सर्जन या तो सीधे ऊर्जा के उपयोग के ज़रिए होता है या सप्लाई चेन उत्सर्जन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. दुनिया भर में खपत आधारित उत्सर्जन प्रति व्यक्ति 4.69 टन है जिसमें 1990 से 2021 के दौरान 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. घरों में वैश्विक ऊर्जा का 29 प्रतिशत हिस्सा उपभोग होता है और इसके परिणामस्वरूप 21 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का उत्सर्जन होता है. विश्व में प्रति व्यक्ति 35 किग्रा प्लास्टिक की खपत होती है जिसमें दो-तिहाई हिस्सा शहरी घरों से उत्पन्न होता है. इसके अलावा शहरी आबादी का 13 प्रतिशत हिस्सा खाना बनाने के लिए प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन एवं तकनीकों का उपयोग करता है और 38 प्रतिशत लोगों के पास सुरक्षित सफ़ाई व्यवस्था की कमी है. साथ ही ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ शहरों में स्वच्छ पेयजल की कमी वाले घरों की संख्या में वर्ष 2000 के मुक़ाबले 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. G20 देशों में खपत के ज़रिए छोटे कणों के वायु प्रदूषण, अधिकतर शहरी क्षेत्रों में, का नतीजा हर वर्ष 20 लाख समय से पूर्व मौतों के रूप में निकलता है. 

 

जीवन शैली में बदलाव से बड़े पैमाने पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को ‘हल्का करने’ और ‘नियंत्रण’ की उम्मीदों के बावजूद व्यवहार जटिल सांस्कृतिक संदर्भों, प्रावधान की प्रणाली और सामाजिक परंपराओं में जुड़े हैं. 

 

व्यक्ति, मिलना-जुलना और जलवायु अनुकूल स्वस्थ शहर

 

खपत आधारित कार्बन उत्सर्जन को उपभोक्ताओं के व्यवहार और जीवन शैली से जोड़ा जा सकता है जो शहरों के व्यापक पर्यावरण पर जवाब देता है. जीवन शैली में बदलाव से बड़े पैमाने पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को ‘हल्का करने’ और ‘नियंत्रण’ की उम्मीदों के बावजूद व्यवहार जटिल सांस्कृतिक संदर्भों, प्रावधान की प्रणाली और सामाजिक परंपराओं में जुड़े हैं. इस तरह एक ‘सतत जीवन शैली’ की गतिविधि का निर्माण करने के लिए दो तरफ़ा कार्रवाई की आवश्यकता है- पहली कार्रवाई नागरिकों के द्वारा स्वैच्छिक प्रयासों के माध्यम से और दूसरी कार्रवाई नीतियों एवं नियमों के द्वारा हस्तक्षेप से. लेकिन उपभोग, व्यवहारों और जीवन शैली को लक्षित करने वाले पारस्परिक मांग की तरफ़ के समाधान पर अतीत में पर्याप्त रूप से ध्यान नहीं दिया गया है. पिछले दिनों पर्यावरण को लक्ष्य बनाकर व्यक्तिगत एवं सामुदायिक कार्रवाई के लिए मांग से प्रेरित जन आंदोलन की पहल करने के उद्देश्य से भारत ने कॉप26 के दौरान LiFE (लाइफ़स्टाइल फॉर एनवायरमेंट या पर्यावरण के लिए जीवन शैली) अभियान की घोषणा की जो जलवायु के विमर्श में पर्यावरण के प्रति सचेत जीवन शैली को केंद्र में रखता है. 

LiFE के लिए इशारा

 

LiFE अभियान ‘इशारा करके’ व्यवहार परिवर्तन के संचार की परिकल्पना करता है ताकि पसंद की संरचना के साथ लोगों के निर्णय लेने को बदला जा सके. क्या और कितना खाना चाहिए, ख़रीदना चाहिए, और यात्रा करनी चाहिए, इन विषयों को लेकर लोगों के निर्णय का धरती की सेहत पर गंभीर असर पड़ सकता है. LiFE जैसे अभियान ‘लोगों के व्यवहार के संक्रमण’ के माध्यम से विचारों एवं व्यवहारों के प्रसार को शुरू करके खपत के पैटर्न में बदलाव के लिए जन आंदोलन का आह्वान करते हैं जिसका स्वस्थ जनसंख्या एवं शहरों के संदर्भ में महत्वपूर्ण असर पड़ सकता है. इसके साथ-साथ ये अभियान SDG 12 (ज़िम्मेदारी से खपत एवं उत्पादन), SDG 7 (स्वच्छ ऊर्जा), SDG 6 (साफ़ पानी एवं स्वच्छता) और SDG 15 (भूमि पर जीवन) पर भी लक्ष्य साधते हैं. 

स्थानीय शासन व्यवस्था: बदलाव का एक एजेंट

 

विकेंद्रीकृत स्तर पर खपत के पैटर्न पर लक्ष्य साधने वाली एकीकृत कार्रवाई जलवायु अनुकूल शहरों के लिए महत्वपूर्ण है. हालांकि स्थानीय सरकारों को अक्सर वैश्विक जलवायु वार्ता में कोई भूमिका नहीं मिलती है. पहल पर असर डालने वाली एक एकीकृत एवं सम्मिलित योजना, जो कि अलग-अलग स्तरों पर सरकारों एवं शासन व्यवस्था के सभी क्षेत्रों के बीच हो, की आवश्यकता है. इसलिए ये सिफ़ारिश की जाती है कि नगरपालिका के स्तर पर एक अलग टास्क फोर्स और सतत शहरी परामर्श समिति का गठन किया जाए ताकि मापने योग्य स्थानीय लक्ष्यों पर निगरानी के साथ एक दीर्घकालीन कार्य योजना बनाई जा सके. 

 

LiFE अभियान में प्रस्तावित धरती के अनुकूल काम करने वाले लोगों से बना पारिस्थितिकी तंत्र धरती की सेहत को सुधारने की दिशा में सामुदायिक भागीदारी के मॉडल के लिए आगे बढ़ने की प्रेरणा के रूप में काम कर सकता है.

 

सतत उपभोग को अनगिनत प्रणालियों के द्वारा शहरी स्थानीय निकायों के ज़रिए आगे बढाया जा सकता है. इन प्रणालियों में से कुछ इस प्रकार हैं: 

ए) जागरुकता: पारिस्थितिकीय निशान, उत्पाद के जीवन चक्र को लेकर उपभोक्ताओं की पर्यावरणीय जागरुकता को बढ़ाना. इसके लिए पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को अपनाकर स्वस्थ जीवन शैली को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. 

बी) बाज़ार रणनीति: पर्यावरण को लेकर प्रदर्शन और लोगों की सेहत के बीच गहन संबंध वाली कंपनियों को बढ़ावा देना. इस तरह इनोवेटिव ख़रीद की प्रक्रिया एवं छोटे सप्लाई चेन का समर्थन किया जा सकता है और उपभोक्ताओं को अधिकार प्रदान करने के लिए पर्यावरण का ठप्पा लगाने का समर्थन किया जा सकता है. 

सी) मार्गदर्शन: प्रदूषण के लिए मानकों एवं मानदंडों को लागू करना और प्रादेशिक सरकारों को कार्यान्वयन एवं मूल्यांकन के लिए आवश्यक शक्ति सौंपना. 

डी) नीतियां: परिवहन एवं आवागमन की नीतियों को शुरू करना जिसमें सॉफ्ट ट्रांसपोर्ट (पैदल चलना, साइकिल से जाना) एवं कार पूलिंग के उपयोग को सुगम बनाना शामिल है; सुरक्षित, किफ़ायती, सबकी पहुंच के योग्य और सतत परिवहन की प्रणाली प्रदान करना; पारिस्थितिकीय क्षेत्र, सार्वजनिक एवं हरित क्षेत्र जैसे संरचनाओं की स्थापना; भूमि के उपयोग की ऐसी नीतियां विकसित करना जो ठोस शहरी डिज़ाइन को बढ़ावा दे और ऊर्जा दक्षता, कूड़ा प्रबंधन एवं पुनर्चक्रण के द्वारा वृत्तीय अर्थव्यवस्था को लागू करे. 

ई) विनियमन: इमारतों के लिए पर्यावरणीय एवं ऊर्जा दक्षता के मानकों को सुनिश्चित करना; ईंधन पर कार्बन कर, भीड़-भाड़ पर शुल्क एवं अलग-अलग संपत्ति कर के रूप में प्रदूषण पैदा करने वालों से वसूली के सिद्धांत को लागू करना; खाद्य सुरक्षा मानकों की स्थापना करना और अन्य वित्तीय प्रोत्साहनों एवं निरुत्साह करने वाले उपायों की शुरुआत करना ताकि पर्यावरण के अनुसार सतत व्यवहार को लागू किया जा सके. 

स्वस्थ शहरों की राह में स्थानीय निकायों के द्वारा कई तरह के सामाजिक, बाज़ार आधारित एवं नीतिगत उपायों का इस्तेमाल किया जा सकता है. LiFE अभियान में प्रस्तावित धरती के अनुकूल काम करने वाले लोगों (जिनकी पर्यावरण के हित में जीवन शैली को अपनाने और बढ़ावा देने की साझा प्रतिबद्धता हो) से बना पारिस्थितिकी तंत्र धरती की सेहत को सुधारने की दिशा में सामुदायिक भागीदारी के मॉडल के लिए आगे बढ़ने की प्रेरणा के रूप में काम कर सकता है. भारत की G20 की अध्यक्षता सरकारी स्तर पर सहयोग के ज़रिए इस अभियान के अंतर्राष्ट्रीयकरण के लिए एक अद्वितीय अवसर प्रदान कर सकती है. साथ ही ये शहरी नियोजन की प्रक्रिया में निरंतरता एवं स्वास्थ्य योजना को जोड़कर अर्बन 20 शहरों को वैश्विक किरदार के रूप में बढ़ावा दे सकती है.


ये लेख G20- थिंक20 पर समीक्षा श्रृंखला टास्क फोर्स 3: सुख के लिए जीवन, अनुकूलता और मूल्य का एक हिस्सा है.