भारत और ब्राज़ील में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और साझा डिजिटल जानकारी के ज़रिये बेहतर डिजिटल संप्रभुता का निर्माण!

Luca Belli

पिछले दशक में डिजिटल संप्रभुता को लेकर कई तरह की बहस देखी गई. ये एक ऐसा बहुचर्चित विषय है जिसकी पूरी दुनिया में एक समान परिभाषा अभी तक नहीं है. संप्रभुता की परंपरागत धारणाएं देश की प्रमुख विशेषताओं के साथ नज़दीकी तौर पर जुड़ी हुई हैं और डिजिटल संप्रभुता की साझा समझ की कमी ने कई तरह के अर्थों को प्रेरित किया है जिसमें इस विवादित विचार के बारे में निरंकुश या संरक्षणवादी संकेतों पर अक्सर जोर दिया गया है.

इस लेख में एक अलग रवैया अपनाया गया है जिसके तहत “बेहतर डिजिटल संप्रभुता” की धारणा को आगे किया गया है. ये धारणा इस विचार पर आधारित है कि कोई भी संस्थान (सिर्फ देश नहीं) डिजिटल तौर पर संप्रभु हो सकता है जब वो तक़नीक को समझने के योग्य हो और उसका इस्तेमाल अपने लाभ के लिए करे. इस परिदृश्य में डिजिटल संप्रभुता टेक्नोलॉजी के कामकाज को समझने की किसी की क्षमता और इससे मिला अधिकार है.

लोग, देश और कोई अन्य संस्थान उस वक़्त डिजिटल तौर पर संप्रभु होते हैं जब वो आत्मनिर्णय के मूलभूत अधिकार का पूरी तरह आनंद उठा सकते हैं और UN चार्टर के अनुच्छेद 1 में नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय नियम और आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय नियम में बताए गए “अपने आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास” का अनुकरण करें. जो डिजिटल तौर पर संप्रभु हैं वो अपने द्वारा निर्मित या उपयोग किए जाने वाले डेटा, सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर पर अपना अधिकार जता सकते हैं. इसके विपरीत जो डिजिटल रूप से संप्रभु नहीं है, उनके पास ऐसा अधिकार नहीं होता.

एक स्पष्ट डिजिटल संप्रभुता की रणनीति नहीं होने के बावजूद भारत और ब्राज़ील ऐसे कई दिलचस्प उदाहरण पेश करते हैं कि कैसे बेहतर डिजिटल संप्रभुता पहले से मौजूद है और इसे या तो टॉप डाउन (ऊपरी तौर पर निर्णय लेकर नीचे बताना) या बॉटम-अप (बड़ी समस्या को छोटी-छोटी समस्याओं में बांट लेना) अप्रोच (दृष्टिकोण) को अपनाकर बनाया जा सकता है. रियो डी जेनेरो के FGV लॉ स्कूल के सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी एंड सोसायटी की मेज़बानी में आयोजित साइबरब्रिक्स (CyberBRICS) प्रोजेक्ट की रिसर्च पर आधारित अगले हिस्सों में कुछ उदाहरण प्रदान किए गए हैं कि कैसे G20 के मौजूदा और आने वाले वर्षों के मेज़बान देश पब्लिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और साझा डिजिटल जानकारी के जरिए बेहतर डिजिटल संप्रभुता का निर्माण कर रहे हैं.

भारत का यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस

डिजिटल संप्रभुता को लेकर भारतीय दृष्टिकोण, जो भले ही स्पष्ट रूप से इस तरह नहीं बताया गया है, सार्वजनिक राष्ट्रीय डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर बनाया गया है और इसे इंडियास्टैक (भारत के लोगों को डिजिटल युग में ले जाने के लिए एक यूनिफाइड सॉफ्टवेयर प्लैटफॉर्म की महत्वाकांक्षी परियोजना) में संगठित किया गया है. ये एकीकृत दृष्टिकोण, जो डिजिटल इंडिया प्लान में है, तीन मूलभूत बुनियादों पर आधारित है: डिजिटल आइडेंटिटी सिस्टम आधार, यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस नाम का इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट सिस्टम और पर्सनल डेटा कंसेंट मैनेजमेंट सिस्टम जिसे डेटा एम्पावरमेंट एंड प्रोटेक्शन आर्किटेक्चर (DEPA) कहा गया है.

वैसे तो इनमें से कोई भी बुनियाद आलोचनाओं से परे नहीं है लेकिन ये स्वीकार करना महत्वपूर्ण है कि ये सबसे महत्वाकांक्षी और सफल डिजिटल कायापलट की कोशिशों में से एक का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसका उद्देश्य डिजिटल पहचान, डिजिटल भुगतान और लगभग 1.5 करोड़ लोगों की भारतीय आबादी के व्यक्तिगत डिजिटल डेटा के प्रबंधन की क्षमता है.

इस संदर्भ में UPI की स्थापना भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारतीय बैंक संघ के द्वारा पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट 2007 के अनुसार की गई है और इसका संचालन गैर-लाभकारी संस्था भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) के द्वारा किया जाता है. UPI की शुरुआत 2016 में एक खुले API (एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस) पर आधारित तुरंत भुगतान वाले नेटवर्क के तौर पर की गई थी. इसके पीछे सोच ये थी कि किसी भी तरह के स्मार्टफोन के द्वारा इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा. इस तरह एक ओर जहां हर किसी की पहुंच ऑनलाइन भुगतान तक होगी वहीं सभी भागीदार देश में बने मौजूदा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के आधार पर आसानी से इनोवेट कर सकेंगे.

UPI को चौंका देने वाली सफलता मिली है. अप्रैल 2023 तक UPI के जरिए लगभग 9 अरब लेन-देन की उपलब्धि हासिल हो चुकी है. साफ तौर पर इस सफलता के पीछे पिछले सात वर्षों के दौरान इंटरनेट कनेक्टिविटी में भारी बढ़ोतरी का भी योगदान है. इंटरनेट कनेक्टिविटी में बढ़ोतरी को मजबूत नेटवर्क न्यूट्रैलिटी (तटस्थता), जिसे 2016 में ही अपनाया गया था, के नियमों के सकारात्मक असर के तौर पर देखा जा सकता है. इसने प्रतिस्पर्धा में बढ़ोतरी करते हुए भारत के लोगों तक मोबाइल इंटरनेट की पहुंच में भेदभाव न होने की गारंटी भी दी है.

ब्राज़ील का पिक्स पेमेंट सिस्टम

2020 में ब्राज़ीलियन सेंट्रल बैंक (BCB) ने UPI से काफी हद तक मिलती-जुलती एक पहल की शुरुआत की जिसे “पिक्स पेमेंट सिस्टम” या आम तौर पर “पिक्स” का नाम दिया गया. BCB के 12 अगस्त 2020 के रेगुलेशन 1 के ज़रिये इसे अपनाने के समय से पिक्स ब्राज़ील में सबसे ज्य़ादा इस्तेमाल किया जाने वाला भुगतान का तरीका बन गया है और ब्राज़ील की कुल जनसंख्या के 70 प्रतिशत लोगों के द्वारा इसे अपनाया जा रहा है.

बिना किसी खर्च के चौबीसों घंटे और सातों दिन इसका इस्तेमाल पैसे का ट्रांसफर करने में किया जा सकता है. इस तरह आर्थिक लेन-देन में काफी आसानी हुई है. पिक्स के इस्तेमाल के लिए सिर्फ स्मार्टफोन, बैंक खाता और इंटरनेट कनेक्टिविटी की ज़रूरत है. इस बात पर ध्यान देना भी महत्वपूर्ण है कि उल्लेखनीय रूप से आगे बढ़ने के बावजूद ग्लोबल साउथ (विकासशील देश) के ज़्यादातर देशों की तरह ब्राज़ील में भी सभी लोग पिक्स के लिए जरूरी संसाधन जुटाने का इंतजाम नहीं कर सकते हैं. इस मामले में ये महज संयोग नहीं है कि ब्राज़ील के 70 प्रतिशत लोग पिक्स का इस्तेमाल करते हैं और इतने ही लोग स्मार्टफोन के जरिए मुख्य रूप से मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं.

इस बात पर ज़ोर देना भी महत्वपूर्ण है कि पिक्स के पहले ब्राज़ील में 24/7 के आधार पर तुरंत इलेक्ट्रॉनिक भुगतान का एकमात्र विकल्प विदेशी ई-पेमेंट कंपनियों जैसे कि वीजा और मास्टरकार्ड के नेटवर्क का इस्तेमाल करना था जो हर लेन-देन पर 3 प्रतिशत फीस चार्ज करने के अलावा अपने सभी यूज़र्स का डेटा कलेक्शन भी करती थीं. ये शर्तें मुख्य कारण हैं जो पिक्स जैसे पब्लिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास को बेहतर डिजिटल संप्रभुता के दृष्टिकोण से काफी प्रासंगिक बनाते हैं.

पिक्स की शुरुआत के पहले वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसी बड़ी कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका का अर्थ ये था कि वास्तव में डिजिटल भुगतान की संप्रभुता दो विदेशी किरदारों को सौंपी गई थी जो न सिर्फ़ पेमेंट सिस्टम से मोटा मुनाफा कमा रही थीं बल्कि बिग डेटा एनालिटिक्स की मदद से इस सेक्टर को रेगुलेट भी कर रही थीं.

वास्तव में इस बात पर जोर देना जरूरी है कि इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट कंपनियों का न केवल आर्थिक काम-काज है बल्कि अनिवार्य रूप से वो डेटा गवर्नेंस का भी काम करती हैं. उनके बिजनेस मॉडल और रणनीति की निर्भरता दिनों-दिन (व्यक्तिगत) डेटा प्रोसेसिंग पर बढ़ रही है जो उनकी तरफ से ली जाने वाली फीस जितनी ही कीमती बन जाती है.

इस परिप्रेक्ष्य में एक घरेलू पब्लिक डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा देना तीन लक्ष्यों को हासिल करने में मददगार है: पेमेंट को आसान बनाने और हर किसी तक पहुंचाने के लिए, बाजार एवं डेटा केंद्रीकरण को कम करने के लिए और सेंट्रल बैंक ऑफ ब्राज़ील (न कि दो विदेशी कंपनियों को) को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के बारे में अनूठी जानकारी मुहैया कराने के लिए. इस तरह ग्लोबल साउथ की उस विशेषता के रुझान को पलटा जा सकता है जिसे कई विद्वानों ने “डेटा उपनिवेशवाद” के तौर पर परिभाषित किया है.

कम्यूनिटी नेटवर्क: साझा डिजिटल जानकारी के जरिए बेहतर डिजिटल संप्रभुता को बढ़ावा

एक अंतिम लेकिन जरूरी सोच-विचार है कि बेहतर डिजिटल संप्रभुता को न केवल सरकार की गतिविधियों के द्वारा बढ़ाया जा सकता है बल्कि बॉटम-अप दृष्टिकोण से स्थानीय समुदायों के द्वारा भी विकसित किया जा सकता है. इस मामले में एक महत्वपूर्ण उदाहरण कम्यूनिटी नेटवर्क, क्राउडसोर्स्ड कनेक्टिविटी की पहल पेश करती हैं जो भारत और ब्राज़ील- दोनों देशों में इंटरनेट तक पहुंच का विस्तार करने के लिए तेजी से प्रासंगिक भूमिका निभा रही है.

कम्यूनिटी नेटवर्क क्राउडसोर्स्ड, बॉटम-अप पहल है जिन्हें स्थानीय समुदायों के द्वारा डिजिटल बंटवारे से पार पाने और “नेटवर्क आत्मनिर्णय[i] को हासिल करने के लिए साझा डिजिटल जानकारी के तौर पर तैयार करके चलाया जा रहा है. इस तरह वो साबित कर रहे हैं कि इंटरनेट कनेक्टिविटी को स्थानीय समुदायों के द्वारा, स्थानीय समुदायों के लिए तैयार किया जा सकता है. कनेक्टिविटी के विस्तार के लिए ये वैकल्पिक और सहायक रणनीतियां आत्मनिर्णय के सबसे अच्छे उदाहरण हैं जो दिखाते हैं कि स्थानीय समुदाय अपना खुद का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, सर्विस और कंटेंट विकसित करके अपने डिजिटल भविष्य का नायक बन सकते हैं.

ब्राज़ील की किलोमोबोला[ii] समुदाय की महिलाएं, ग्रामीण समुदाय और भारत, ब्राज़ील एवं दक्षिण अफ्रीका– जो IBSA डायलॉग फोरम के अपने दोनों साझेदारों यानी भारत और ब्राज़ील के बाद G20 की मेजबानी करेगा- में झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग अपना खुद का कम्यूनिटी नेटवर्क बनाकर अपने डिजिटल भविष्य के नायक बन गए हैं, उन्होंने पूरी तरह से ये सीखा है कि स्थानीय समुदायों की विशेषता के आधार पर स्थानीय समुदायों की ज़रूरत को पूरा करने के लिए इंटरनेट के नये हिस्से को कैसे तैयार किया जाए.

दूसरे शब्दों में कहें तो अतीत में नहीं जुड़ने वाले स्थानीय समुदाय के लोग भी डिजिटल तौर पर संप्रभु हो सकते हैं, टेक्नोलॉजी को समझ सकते हैं, उनका विकास कर सकते हैं और अपने आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास को बढ़ा सकते हैं.

आत्मनिर्णय को बढ़ावा देने के लिए बेहतर डिजिटल संप्रभुता मददगार

डिजिटल संप्रभुता की ये धारणा हमें सोचने की ओर ले जाती है कि ये मान लेना पितृसत्तात्मक और अंतिम रूप से गलत होगा कि केवल सरकार ही डिजिटल संप्रभुता के मूल में हो सकती है, हालांकि उसे महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है. इसके विपरीत “बेहतर डिजिटल संप्रभुता” एक व्यक्तिगत, स्थानीय समुदाय, कंपनी, सरकार और यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय संगठन की पहल भी हो सकती है. हालांकि ये दांव पर लगी पहल पर निर्भर करता है.

इस भावना में इस लेखक का सुझाव है कि डिजिटल संप्रभुता को लेकर एक संशयवादी दृष्टिकोण (ईश्वर की सत्ता के विषय में संशय रखने वाला) अपनाया जाए, किसी खास पहल के गुणों का विश्लेषण किया जाए. डिजिटल संप्रभुता का स्वरूप जो भी हो लेकिन बेहतर डिजिटल संप्रभुता का साझा लक्ष्य हर हाल में तक़नीक के जरिए अधिकार प्रदान करने, प्रगति और समावेशन को बढ़ावा देना होना चाहिए.


[i] I define Network Self-determination as the “right to freely associate in order to define, in a democratic fashion, the design, development and management of network infrastructure as a common good, so that all individuals can freely seek, impart and receive information and innovation.” The concept is based on the consideration that by freely developing connectivity infrastructure, individuals and communities quintessentially enjoy their fundamental right to self-determine, i.e., to “pursue their economic, social and cultural development” through connectivity.

 

[ii] Quilombos are communities that emerged as refuges for African enslaved individuals who escaped exploitation during the period of slavery in Brazil, established by Portuguese colonisers in the 16th century and maintained until 1888. The inhabitants of these communities are called quilombolas. With the adoption of the 1988 Constitution, Brazil enshrined the quilombolas right to own and use the land they were on.